भ्रष्टाचार पर सवाल: “ईमानदार वही, जिसकी बेईमानी पकड़ी न जाए?”

देश में भ्रष्टाचार को लेकर जनमानस में गहरी निराशा और आक्रोश देखने को मिल रहा है। आम लोगों के बीच यह धारणा तेजी से मजबूत होती जा रही है कि आज ईमानदारी की परिभाषा ही बदल गई है। लोग तंज कसते हैं कि “ईमानदार वही है जिसकी बेईमानी पकड़ी नहीं गई और बेगुनाह वह है, जिसका जुर्म साबित न हो पाया हो।” यह सोच व्यवस्था के प्रति घटते विश्वास का संकेत है। सरकारी दफ्तरों में छोटे से छोटे काम के लिए भी पैसे की मांग, विकास योजनाओं में कमीशनखोरी और जमीन-जायदाद से जुड़े मामलों में दलाली की चर्चा अब आम बात हो गई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भ्रष्टाचार की जड़ें व्यवस्था के कई स्तरों तक फैली हैं। नगर निकाय, तहसील, जिला पंचायत से लेकर बड़े विभागों तक “रेट तय” होने की बातें खुलेआम सुनने को मिलती हैं। जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों की संपत्तियों में अचानक वृद्धि भी समय-समय पर सवाल खड़े करती रही है। हालांकि भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए केंद्रीय सतर्कता आयोग, लोकपाल और केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो जैसी संस्थाएं कार्यरत हैं, फिर भी आम नागरिकों को त्वरित और निष्पक्ष कार्रवाई की उम्मीद अक्सर अधूरी लगती है।
कानूनी जानकार बताते हैं कि भ्रष्टाचार के मामलों में निलंबन और बहाली की प्रक्रिया कानून के तहत होती है। दोष सिद्ध होने तक कर्मचारी को सेवा में लौटने का अवसर मिल सकता है, लेकिन लंबी जांच और अदालती प्रक्रिया से जनता में भ्रम और असंतोष पैदा होता है। सवाल यह भी उठता है कि आखिर कब तक गरीब और मध्यम वर्ग इस व्यवस्था का बोझ उठाते रहेंगे? भ्रष्टाचार पर प्रभावी प्रहार के लिए केवल नारे नहीं, बल्कि सशक्त राजनीतिक इच्छाशक्ति, पारदर्शिता और जवाबदेही की सख्त व्यवस्था की आवश्यकता है। जब तक शीर्ष स्तर से ठोस कदम नहीं उठाए जाएंगे, तब तक यह समस्या ज्यों की त्यों बनी रहने की आशंका बनी रहेगी।



