वन विभाग में कथित घोटाले से मचा हड़कंप, अवैध कटान और लकड़ी के दुरुपयोग के आरोप

डिप्टी रेंजर ने उप प्रभागीय वनाधिकारी पर लगाए गंभीर आरोप, जांच जारी,कार्रवाई पर उठ रहे सवाल
महराजगंज। सोहगीबरवा वन्य जीव प्रभाग के लक्ष्मीपुर रेंज में अवैध कटान और विभागीय अनियमितताओं का मामला सामने आने के बाद वन विभाग में हलचल तेज हो गई है। डिप्टी रेंजर द्वारा अपने ही उच्चाधिकारी पर गंभीर आरोप लगाए जाने से प्रकरण ने तूल पकड़ लिया है। वहीं, ग्रामीणों में विभागीय कार्यप्रणाली को लेकर नाराजगी बढ़ती जा रही है।
मामला लक्ष्मीपुर रेंज के अचलगढ़ बीट का है, जहां 12 जनवरी 2026 को साखू (साल) के एक पेड़ के अवैध कटान की शिकायत पर जांच की गई। जांच के दौरान मौके पर पेड़ का ठूंठ और बुरादा मिला, जिससे पेड़ काटे जाने की पुष्टि हुई। रिपोर्ट में चार बोटे (लकड़ी के टुकड़े) बनाए जाने का उल्लेख है, लेकिन मौके से कोई लकड़ी बरामद नहीं हो सकी।
प्रकरण में प्रभागीय वनाधिकारी ने क्षेत्रीय वन अधिकारी, सेक्शन प्रभारी और बीट प्रभारी से दो दिन के भीतर स्पष्टीकरण मांगा। इसी क्रम में डिप्टी रेंजर आलोक कुमार मिश्रा ने 19 जनवरी 2026 को दिए अपने जवाब में चौंकाने वाले आरोप लगाए।
उन्होंने कहा कि अचलगढ़ बीट से काटी गई लकड़ी उप प्रभागीय वनाधिकारी लक्ष्मीपुर द्वारा निजी उपयोग के लिए मंगाई गई थी। साथ ही यह भी आरोप लगाया कि संबंधित अधिकारी द्वारा अक्सर लकड़ी की मांग की जाती थी और इसके लिए दबाव भी बनाया जाता था।
डिप्टी रेंजर के आरोपों के बाद मामला और गंभीर हो गया है। सवाल उठ रहे हैं कि जब एक अधिकारी ने लिखित रूप में इतने गंभीर आरोप लगाए हैं, तो अब तक संबंधित उप प्रभागीय वनाधिकारी के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई क्यों नहीं हुई।
ग्रामीणों का आरोप है कि विभागीय मिलीभगत के चलते अवैध कटान और वन संसाधनों का दुरुपयोग जारी है। उनका कहना है कि कटे हुए पेड़ों की लकड़ी कहां गई, इसका जवाब अब तक नहीं मिला है।
इस संबंध में प्रभागीय वनाधिकारी निरंजन सुर्वे ने बताया कि मामले की जांच बलरामपुर जनपद के सुहेलवा वन्यजीव प्रभाग द्वारा कराई जा रही है। उन्होंने कहा कि संबंधित अधिकारी जांच अधिकारी के समक्ष अपना पक्ष रखेंगे और रिपोर्ट आने के बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी।
हालांकि, जांच जारी रहने के बावजूद अब तक कोई ठोस कार्रवाई न होने से विभाग की कार्यशैली पर सवाल उठ रहे हैं। यदि आरोप सही साबित होते हैं, तो यह मामला न केवल वन संपदा के दुरुपयोग का होगा, बल्कि विभागीय अनुशासन और पारदर्शिता पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करेगा।



