किसको याद रखता है उम्र भर कोई, आदमी जल्द भूल जाता है :- फ़िराक़
फ़िराक़ साहब की पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि-
हर्षोदय टाइम्स (सुनील गहलोत)
अपना गोरखपुर जब जब चंद अच्छी वजह और लोगों के नाते जाना जाता है तो उसमे फ़िराक़ का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। मतलब फ़िराक़ वह वजह हैं जिससे गोरखपुर पूरे देश व दुनिया में जाना जाता है।
फिराक साहब ने लिखा है – किसको याद रखता है उम्र भर कोई, आदमी जल्द भूल जाता है। आज उन्ही की पंक्तियां उन पर ही लोगों ने लागू कर दिया है।
उनका व्यक्तित्व हिंदुस्तान के माथे का टीका, उर्दू जबान की आबरू और शायरी की मांग का सिंदूर है। इसके बाद भी उनका पैतृक गांव बनवारपार भारी उपेक्षा का शिकार है।उनका जन्मतिथि हो या पुण्यतिथि कोई भी सरकारी नुमाईंदा श्रद्धा के दो फूल चढ़ाने नहीं आता। दुर्भाग्य है कि स्वतंत्रता संघर्ष में भी उनका योगदान गौड़ बनकर रह जाता है। यहां तक कि इस गाँव मे स्थित प्राथमिक विद्यालय भी फ़िराक़ साहब के नाम पर नहीं है। स्वतंत्रता संघर्ष में किये गए योगदान को लोगों ने इस कदर भुलाया की गोला ब्लॉक मुख्यालय पर स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की याद में लगे शिलालेख पर भी फिराक का नाम नहीं है।
इस सबमें गांव के डॉक्टर छोटेलाल यादव ने फ़िराक़ साहब सेवा संस्थान बनाकर उनके नाम को जीवित रखने का प्रयास किया है। श्री यादव ने उनके नाम पर एक निजी विद्यालय ,फ़िराक़ स्मारक ,फिराक स्मृति द्वार और उनके स्मृति में एक लाइब्रेरी भी खोल रखी है।
गोरखपुर के गोला विकास खण्ड के ग्राम बनवारपार के एक कायस्थ परिवार में जन्मे रघुपति सहाय उर्फ फ़िराक़ गोरखपुरी ने अपने फन व हुनर के माध्यम से पूरी दुनिया को अपना कायल बना लिया। हिंदुस्तान की सरजमीं पर अनेक हस्तियां पैदा हुईं किंतु उर्दू अदब के क्षेत्र में बीसवीं सदी में फ़िराक़ साहब ने जो मुक़ाम हासिल किया वहां तक पहुंचना किसी के लिए भी काफी दुरूह है। आजतक जो मक़बूलियत फ़िराक़ साहब को हासिल हुई है।वह उर्दू के बहुत कम शायरों को नसीब हुई। 86 वर्ष की अवस्था में 3 मार्च 1982 को फ़िराक़ ने – “अब तुझसे रुख़सत होता हूँ,आओ सम्भालो साजे गज़ल,नए तराने छेड़ो,मेरे नगमों को नींद आती है”..
कहकर अंतिम सांस ली।



