उत्तर प्रदेशमहराजगंज

बढ़ता उन्माद और संवेदनहीनता समाज के लिए घातक

महराजगंज। मानव जीवन को भारतीय ज्ञान परंपरा में अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। प्रकृति, जीव-जंतु और समस्त सृष्टि के संरक्षण में मानव की भूमिका सबसे अहम है। ऐसे में मनुष्य के भीतर बढ़ता उन्माद, आपसी अविश्वास और संवेदनहीनता न केवल सामाजिक मूल्यों को कमजोर कर रही है, बल्कि समाज और प्रकृति दोनों के लिए गंभीर चुनौती बनती जा रही है।

स्वतंत्र लेखक एवं शिक्षक रवीन्द्र शर्मा ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि मनुष्य ने स्वयं को धर्म, वर्ग, वर्ण, संप्रदाय और जाति के आधार पर अनेक हिस्सों में बांट लिया है। इसके कारण धार्मिक, साम्प्रदायिक, वर्गीय और जातीय संघर्ष लगातार बढ़े हैं। इतिहास गवाह है कि इन संघर्षों के कारण बड़ी संख्या में लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी है। सामाजिक और पारिवारिक विघटन ने भी मानव जीवन को कठिन बना दिया है।

उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में लोगों के बीच आपसी विश्वास और प्रेम की कमी स्पष्ट दिखाई दे रही है। मनुष्य स्वयं को दूसरे मनुष्य से धर्म, जाति, वर्ग अथवा संप्रदाय के आधार पर श्रेष्ठ साबित करने की होड़ में लगा हुआ है। इससे समाज में दूरियां बढ़ रही हैं और मानवीय संवेदनाएं कमजोर पड़ती जा रही हैं। स्थिति यहां तक पहुंच गई है कि कई लोग मनुष्यों की अपेक्षा पशुओं पर अधिक विश्वास करने लगे हैं।

शर्मा के अनुसार आधुनिक जीवनशैली और मोबाइल फोन के अत्यधिक इस्तेमाल ने पारिवारिक संवाद को भी प्रभावित किया है। एक ही छत के नीचे रहने के बावजूद कई परिवारों में माता-पिता और बच्चों के बीच संवाद लगातार कम हो रहा है। नात-रिश्तेदारों के बीच पहले जैसी आत्मीयता भी कमजोर हुई है। उन्होंने कहा कि सामाजिक जीवन में दिखावे और स्वयं को श्रेष्ठ साबित करने की प्रवृत्ति बढ़ रही है, जो मानवीय मूल्यों के लिए चिंताजनक है।

उन्होंने सवाल उठाया कि वैज्ञानिक युग में आगे बढ़ते हुए क्या मनुष्य अपने मानवीय मूल्यों से दूर होता जा रहा है? क्या हमारी सोच केवल आपसी संघर्ष तक सीमित रह गई है? उन्होंने कहा कि समाज को इस दिशा में गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। मानव मात्र को समान समझने और ‘जियो और जीने दो’ की नीति अपनाने से ही स्वस्थ एवं संवेदनशील समाज का निर्माण संभव है।

उन्होंने प्रकृति, जीव-जंतुओं और पेड़-पौधों के प्रति संवेदनशीलता विकसित करने पर भी जोर दिया। कहा कि प्रकृति ने मनुष्य को विवेक और बुद्धि प्रदान की है, इसलिए उसके संरक्षण की जिम्मेदारी भी मनुष्य की ही है। समाज में आपसी भाईचारा, एकता, अखंडता और प्रेम की भावना को मजबूत करना समय की आवश्यकता है।

संत कबीर के दोहे का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा—

“पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय।

ढाई आखर प्रेम का, पढ़ै सो पंडित होय॥”

उन्होंने कहा कि आज समाज को ज्ञान के साथ-साथ प्रेम, करुणा, सहिष्णुता और मानवीय संवेदनाओं की भी उतनी ही आवश्यकता है।

— रवीन्द्र शर्मा, स्वतंत्र लेखक एवं शिक्षक

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
.site-below-footer-wrap[data-section="section-below-footer-builder"] { margin-bottom: 40px;}