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जिम्मेदारियों से विमुख होता समाज ,  विकास के साथ संस्कार भी जरूरी

हर्षोदय टाइम्स ब्यूरो

महराजगंज : भारत ने आजादी के बाद अभाव, अकाल, युद्ध और आर्थिक चुनौतियों का सामना करते हुए आत्मनिर्भरता की ओर उल्लेखनीय यात्रा तय की है। “जय जवान, जय किसान” से लेकर “जय जवान, जय किसान, जय विज्ञान” तक का सफर केवल आर्थिक और वैज्ञानिक प्रगति का प्रतीक नहीं रहा, बल्कि यह राष्ट्र की सामूहिक चेतना, जिम्मेदारी और त्याग का भी परिचायक था। उस दौर में संसाधन सीमित थे, लेकिन परिवार, समाज और रिश्तों की नींव बेहद मजबूत थी।

संयुक्त परिवार भारतीय समाज की पहचान हुआ करते थे। घर के बुजुर्ग अनुभव और संस्कार के केंद्र माने जाते थे। परिवार का प्रत्येक सदस्य अपनी जिम्मेदारियों को समझता और उनका निर्वहन करता था। आर्थिक तंगी के बावजूद अपनापन और पारिवारिक एकता समाज की सबसे बड़ी पूंजी थी।

समय के साथ शिक्षा, रोजगार, तकनीक और आर्थिक अवसरों का विस्तार हुआ। युवाओं ने बड़े शहरों और विदेशों में अपनी पहचान बनाई। यह परिवर्तन आवश्यक भी था और देश के विकास के लिए सकारात्मक भी। किंतु इस विकास के साथ एक चिंता भी सामने आई संयुक्त परिवारों का विघटन और बुजुर्गों का बढ़ता अकेलापन।

आज अनेक माता-पिता अपने बच्चों को बेहतर भविष्य देने के लिए जीवनभर संघर्ष करते हैं, लेकिन वृद्धावस्था में वही माता-पिता अकेलेपन, उपेक्षा और असुरक्षा का सामना करते दिखाई देते हैं। यह स्थिति केवल सामाजिक नहीं, बल्कि नैतिक चिंता का विषय भी है। आधुनिक जीवन की व्यस्तता और भौतिक उपलब्धियों की दौड़ कहीं न कहीं पारिवारिक दायित्वों को पीछे छोड़ती नजर आती है।

यह कहना उचित नहीं होगा कि हर शिक्षित युवा अपने माता-पिता की उपेक्षा करता है। आज भी असंख्य परिवार ऐसे हैं, जो अपने बुजुर्गों का सम्मान और सेवा पूरी निष्ठा से करते हैं। लेकिन जिन घटनाओं में माता-पिता अकेले रह जाते हैं या उपेक्षा का शिकार होते हैं, वे समाज के लिए गंभीर चेतावनी हैं। शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं, बल्कि संवेदनशील, जिम्मेदार और संस्कारित नागरिक बनाना भी है।

भारतीय संस्कृति में माता-पिता और गुरु को सर्वोच्च सम्मान दिया गया है। उनकी सेवा को ईश्वर की सेवा के समान माना गया है। यदि आधुनिकता के नाम पर हम इन्हीं मूल्यों से दूर होते गए, तो आर्थिक समृद्धि भी सामाजिक संतोष नहीं दे सकेगी। परिवार केवल साथ रहने का नाम नहीं, बल्कि भावनात्मक सुरक्षा, संस्कार और पीढ़ियों के बीच विश्वास का आधार है।

सरकार ने वरिष्ठ नागरिकों के संरक्षण के लिए कानून बनाए हैं, लेकिन केवल कानून से समस्या का समाधान संभव नहीं है। आवश्यकता समाज में संवेदनशीलता बढ़ाने, पारिवारिक मूल्यों को शिक्षा का हिस्सा बनाने और युवाओं में नैतिक जिम्मेदारी की भावना विकसित करने की है। परिवार के प्रत्येक सदस्य को यह समझना होगा कि आज जिन माता-पिता को हमारी आवश्यकता है, कल वही स्थिति हमारी भी हो सकती है।

विकास तभी सार्थक है, जब वह मानवीय मूल्यों के साथ आगे बढ़े। हमें ऐसा समाज बनाना होगा जहाँ आधुनिकता और संस्कार साथ-साथ चलें, बुजुर्ग सम्मान और सुरक्षा के साथ जीवन बिताएं तथा आने वाली पीढ़ियां अपने कर्तव्यों को अधिकारों जितना ही महत्व दें। यही सच्चे अर्थों में एक संवेदनशील, सशक्त और संस्कारित भारत की पहचान होगी।

रवींद्र शर्मा
शिक्षक एवं स्वतंत्र लेखक

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