आकाशीय बिजली ने छीना पिता, सदमे में मां की भी मौत

28 दिन में उजड़ गई दुनिया, तीन बच्चों के सिर से उठा माता-पिता का साया
महेश यादव ने बढ़ाया मदद का हाथ, तीनों बच्चों की पढ़ाई का उठाएंगे जिम्मा
हर्षोदय टाइम्स ब्यूरो
आनंदनगर/महराजगंज। वक्त ने एक परिवार से ऐसी खुशियां छीन लीं, जिसकी भरपाई शायद कभी नहीं हो सकेगी। पहले आकाशीय बिजली ने पिता की जान ले ली और फिर पति की मौत का सदमा पत्नी भी बर्दाश्त नहीं कर सकीं। महज 28 दिनों के भीतर एक परिवार पूरी तरह बिखर गया। अब तीन मासूम बच्चों के सिर से माता-पिता दोनों का साया उठ चुका है। इस हृदयविदारक घटना ने पूरे क्षेत्र को झकझोर कर रख दिया है।
पुरंदरपुर थाना क्षेत्र के प्राथमिक विद्यालय मानिक तलाव में तैनात शिक्षामित्र पंचम यादव की करीब 28 दिन पहले आकाशीय बिजली की चपेट में आने से मौत हो गई थी। पति की असमय मौत से उनकी पत्नी रिंका देवी गहरे सदमे में थीं। परिजनों के मुताबिक, पति को खोने का गम वह सहन नहीं कर सकीं और करीब 27 दिन बाद हृदयगति रुकने से उनका भी निधन हो गया। कुछ ही दिनों के अंतराल में हुई दो मौतों ने परिवार को ऐसी पीड़ा दी है, जिससे उबर पाना आसान नहीं है।
तीन बच्चों के सामने भविष्य की चुनौती
माता-पिता के निधन के बाद परिवार में अब तीन बच्चे ही रह गए हैं। बड़ी बेटी रिमझिम यादव कक्षा 10 में पढ़ती है, जबकि दूसरी बेटी अजीता यादव इस वर्ष कक्षा सात की छात्रा है। सबसे छोटा बेटा अभियंत प्रताप महेश यादव के मार्गदर्शन में विद्याज्ञान स्कूल, सीतापुर में शिक्षा ग्रहण कर रहा है।
जिस उम्र में बच्चों को माता-पिता के स्नेह, मार्गदर्शन और सहारे की सबसे अधिक जरूरत होती है, उसी उम्र में उन्हें जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी का सामना करना पड़ा है। माता-पिता के जाने से उनके सामने भावनात्मक संकट के साथ ही पढ़ाई और भविष्य को संवारने की चुनौती भी खड़ी हो गई है।
मुश्किल घड़ी में मदद को आगे आए महेश यादव
इस दुखद परिस्थिति में महेश स्टडी सेंटर, स्टेशन रोड भैया फरेंदा के संचालक महेश यादव ने बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी उठाने की पहल की है। उन्होंने कहा कि माता-पिता को खोने का दर्द असहनीय होता है। ऐसे कठिन समय में बच्चों की पढ़ाई बाधित नहीं होनी चाहिए।
महेश यादव ने भरोसा दिलाया कि तीनों बच्चों की शिक्षा की पूरी जिम्मेदारी वह उठाएंगे, ताकि परिवार पर आए इस संकट का असर उनकी पढ़ाई और भविष्य पर न पड़े। उनकी इस पहल को बच्चों के जीवन में उम्मीद की एक नई किरण के रूप में देखा जा रहा है।
संवेदना के साथ सहारे की भी जरूरत
इस घटना के बाद क्षेत्र में शोक और संवेदना का माहौल है। लोगों की सहानुभूति इन बच्चों के साथ है। हालांकि, उनके जीवन में आए इस खालीपन को भर पाना संभव नहीं है, लेकिन शिक्षा, देखभाल और सामाजिक सहयोग के जरिए उनके भविष्य को संवारने का प्रयास जरूर किया जा सकता है।
ऐसे समय में महेश यादव की पहल एक सकारात्मक उदाहरण है। जरूरत इस बात की भी है कि समाजसेवी, जनप्रतिनिधि और सामाजिक संगठन आगे आएं, ताकि माता-पिता को खो चुके इन तीनों बच्चों को शिक्षा और सुरक्षित भविष्य के लिए जरूरी सहयोग मिल सके।



